Friday, December 12, 2014
Saturday, September 1, 2012
लिखे पढ़े होते अगर तो तुमको ख़त लिखते उस ख़त में हम तुम्हे क्या क्या लिखने के बहाने लिखते कुछ ख्वाब अधूरे लिखते कुछ गीत सुहाने लिखते जो बात अभी तक तुमसे घबरा कर बोल न पाए जो भीत तुम्हारे आगे शर्माकर खोल ना पाए अपना दीवानापन खोल कर तो दीवाने लिखते लिखते की घनी बरखा में सूरज की किरण लगती हो सावन की घटा में लिपटा चाँद का बदन लगती हो यादों में तुम्हारी खो कर हम भी अफसाने लिखते जब शाम को ठंडी ठंडी दखान से हवा आती है हर सांस में धीमी धीमी एक आग लगा जाती है कटते हैं तुम्हारे गम में कैसे वो जमाने लिखते
उस ख़त में हम तुम्हे क्या क्या लिखने के बहाने लिखते
कुछ ख्वाब अधूरे लिखते कुछ गीत सुहाने लिखते
जो बात अभी तक तुमसे घबरा कर बोल न पाए
जो भीत तुम्हारे आगे शर्माकर खोल ना पाए
अपना दीवानापन खोल कर तो दीवाने लिखते
लिखते की घनी बरखा में सूरज की किरण लगती हो
सावन की घटा में लिपटा चाँद का बदन लगती हो
यादों में तुम्हारी खो कर हम भी अफसाने लिखते
जब शाम को ठंडी ठंडी दखान से हवा आती है
हर सांस में धीमी धीमी एक आग लगा जाती है
कटते हैं तुम्हारे गम में कैसे वो जमाने लिखते
Saturday, July 7, 2012
ऐसा वादा न कर
'उनको ये शिकायत है.
'उनको ये शिकायत है.. मैं बेवफ़ाई पे नही लिखता,
और मैं सोचता हूँ कि मैं उनकी रुसवाई पे नही लिखता.'
'ख़ुद अपने से ज़्यादा बुरा, ज़माने में कौन है ??
मैं इसलिए औरों की.. बुराई पे नही लिखता.'
...
'कुछ तो आदत से मज़बूर हैं और कुछ फ़ितरतों की पसंद है ,
ज़ख़्म कितने भी गहरे हों?? मैं उनकी दुहाई पे नही लिखता.'
'दुनिया का क्या है हर हाल में, इल्ज़ाम लगाती है,
वरना क्या बात?? कि मैं कुछ अपनी.. सफ़ाई पे नही लिखता.'
'शान-ए-अमीरी पे करू कुछ अर्ज़.. मगर एक रुकावट है,
मेरे उसूल, मैं गुनाहों की.. कमाई पे नही लिखता.'
'उसकी ताक़त का नशा.. "मंत्र और कलमे" में बराबर है !!
मेरे दोस्तों!! मैं मज़हब की, लड़ाई पे नही लिखता.'
'समंदर को परखने का मेरा, नज़रिया ही अलग है यारों!!
मिज़ाज़ों पे लिखता हूँ मैं उसकी.. गहराई पे नही लिखता.'
'पराए दर्द को , मैं ग़ज़लों में महसूस करता हूँ ,
ये सच है मैं शज़र से फल की, जुदाई पे नही लिखता.'
'तजुर्बा तेरी मोहब्बत का'.. ना लिखने की वजह बस ये!!
क़ि शायर इश्क़ में ख़ुद अपनी, तबाही पे नही लिखता
Thursday, February 23, 2012
बचपन
राईटनटाईप पड़ौसी पड़ोसी है हिंदू न मुस्लिम…….
हरेक तश्नालब की हिमायत करूंगा,
समंदर मिला तो शिकायत करूंगा।
अगर आंच आई किसी जिंदगी पर,
हो अपना पराया हिफ़ाज़त करूंगा।
अभी तो ग़रीबों में मसरूफ हूँ मैं,
मिलेगी जो फुर्सत इबादत करूंगा।
तरक्की की ख़ातिर वो यूं कह रहा था,
मैं जिस्मों की खुलकर तिजारत करूंगा।
ज़मीर अपना बेचूंगा जो दौलत कमाउ,
अब इक रास्ता है सियासत करूंगा।
उसूलों पे अपने जो क़ायम रहेगा,
वो दुश्मन भी हो तो मुहब्बत करूंगा।
पड़ौसी पड़ौसी है हिंदू न मुस्लिम,
मैं बच्चो को यही हिदायत करूंगा।
क़लम जो लिखेगा वो बेबाक होगा,
अगर दिल ये माना सहाफत करूंगा।।
Sunday, April 17, 2011
लेकिन मैंने हार ना मानी
राहें कठिन अजानी
संघर्षो की अकथ कहानी
लेकिन मैंने हार न मानी
आशाओं के व्योम अनंतिम
स्वप्नों का ढह जाना दिन दिन
संबंधों के ताने बाने
नातों का अपनापा पल छिन
क्रूर थपेड़े संघर्षों के
दुर्दिन की मनमानी,
लेकिन मैंने हार न मानी
दूर क्षितिज तक अनगिन राहें
अनबूझी सी फैली फैली
लक्ष्य कुहासे जैसा धूमिल
सभी दिशाएँ मैली मैली
कभी समय से टक्कर ली तो
कभी भाग्य से ठानी
लेकिन मैंने हार न मानी
लिए तकाज़े नए नए नित
समय खड़ा था सांझ सकारे
दुनिया के, मनके, भावों के
किसके किसके क़र्ज़ उतारे
बिखरा बिखरा बचपन देखा
टूटी हुई जवानी …..
लेकिन मैंने हार न मानी
कुछ भावों के अश्रु निचोड़े
मनुहारों के धागे जोड़े
टूटे छंद बंद रिश्तों के
जोड़े कुछ तोड़े कुछ छोड़े
निश-दिन के ताने बाने में
बुनती गई कहानी
लेकिन मैंने हार न मानी
यार मिले तो यारी कर ली
दुःख की साझेदारी कर ली
ये न हुआ पर गद्दारों से
मौके पर गद्दारी कर ली
औरों को माफ़ी दे दी
पर अपनी गलती मानी
मैंने तम से हार न मानी
आँखें नम थी पर मुस्काए
रुंधे गले से गीत सुनाये
शब्दों की माला पहनाई
रस छंदों के दीप जलाए
प्रभु को हंस कर किये समर्पित
नयनों निर्झर पानी
लेकिन मैंने हार न मानी
