कुसुम
साल भर की बात है, एक दिन शाम को हवा खाने जा रहा था कि महाशय नवीन से मुलाक़ात हो गयी। मेरे पुराने दोस्त हैं, बड़े बेतकुल्लफ़ और मनचले। आगरे में मकान है, अच्छे कवि हैं। उनके कवि-समाज में कई बार शरीक हो चुका हूँ। ऐसा कविता का उपासक मैंने नहीं देखा। पेशा तो वकालत का है; पर डूबे रहते हैं काव्य-चिंतन में, आदमी ज़हीन हैं, मुक़दमा सामने आया और उसकी तह तक पहुँच गये; इसीलिए कभी-कभी मुक़दमें मिल जाते हैं, लेकिन कचहरी के बाद अदालत या मुक़दमें की चर्चा उनके लिए निषिद्ध है। अदालत की चारदीवारी के अन्दर चार-पाँच घंटे वह वकील होते हैं। चारदीवारी के बाहर निकलते ही कवि हैं- सिर से पाँव तक। जब देखिये, कवि-मण्डल जमा है, कवि-चर्चा हो रही है, रचनाएँ सुन रहे हैं। मस्त हो–होकर झूम रहे हैं, और अपनी रचना सुनाते समय तो उनपर एक तल्लीनता-सी छा जाती है। कण्ठ स्वर भी इतना मधुर है कि उनके पद बाण की तरह सीधे कलेजे में उतर जाते हैं। अध्यात्म में माधुर्य की सृष्टि करना, निर्गुण में सगुण की बहार दिखाना उनकी रचनाओं की विशेषता है। वह जब लखनऊ आते हैं, मुझे पहले सूचना दे दिया करते हैं। आज उन्हें अनायास लखनऊ में देखकर मुझे आश्चर्य हुआ- आप यहाँ कैसे ? कुशल तो है ? मुझे आने की सूचना तक न दी। बोले- भाईजान, एक जंजाल में फँस गया हूँ। आपको सूचित करने का समय न था। फिर आपके घर को मैं अपना घर समझता हूँ। इस तकल्लुफ़ की क्या ज़रूरत है कि आप मेरे लिए कोई विशेष प्रबंध करें। मैं एक ज़रूरी मुआमले में आपको कष्ट देने आया हूँ। इस वक़्त की सैर तो स्थगित कीजिए और चलकर मेरी विपत्ति-कथा सुनिये।मैंने घबड़ाकर कहा- आपने तो मुझे चिन्ता में डाल दिया। आप और विपत्ति-कथा। मेरे तो प्राण सूख जाते हैं।‘घर चलिए, चित्त शान्त हो तो सुनाऊँ !’‘बाल-बच्चे तो अच्छी तरह हैं ?’‘हाँ, सब अच्छी तरह हैं। वैसी कोई बात नहीं है !’‘तो चलिए, रेस्ट्राँ में कुछ जलपान तो कर लीजिये।’‘नहीं भाई, इस वक़्त मुझे जलपान नहीं सूझता।’हम दोनों घर की ओर चले।घर पहुँचकर उनका हाथ-मुँह धुलाया, शरबत पिलाया। इलायची-पान खाकर उन्होंने अपनी विपत्ति-कथा सुनानी शुरू की- ‘कुसुम के विवाह में आप गये ही थे। उसके पहले भी आपने उसे देखा था। मेरा विचार है कि किसी सरल प्रकृति के युवक को आकर्षित करने के लिए जिन गुणों की ज़रूरत है, वह सब उसमें मौजूद है। आपका क्या खयाल है ?’मैंने तत्परता से कहा- मैं आपसे कहीं ज्यादा कुसुम का प्रशंसक हूँ। ऐसी लज्जाशील, सुघड़, सलीक़ेदार और विनोदिनी बालिका मैंने दूसरी नहीं देखी। महाशय नवीन ने करुण स्वर में कहा- वही कुसुम आज अपने पति के निर्दय व्यवहार के कारण रो-रोकर प्राण दे रही है। उसका गौना हुआ एक साल हो रहा है, इस बीच में वह तीन बार ससुराल गयी, पर उसका पति उससे बोलता ही नहीं। उसकी सूरत से बेज़ार है। मैंने बहुत चाहा कि उसे बुलाकर दोनों में सफ़ाई करा दूँ, मगर न आता है, न मेरे पत्रों का उत्तर देता है। न जाने क्या गाँठ पड़ गयी है कि उसने इस बेदर्दी से आँखें फेर लीं। अब सुनता हूँ, उसका दूसरा विवाह होनेवाला है। कुसुम का बुरा हाल हो रहा है। आप शायद उसे देखकर पहचान भी न सकें। रात-दिन रोने के सिवा दूसरा काम नहीं है। इससे आप हमारी परेशानी का अनुमान कर सकते हैं। ज़िन्दगी की सारी अभिलाषाएँ मिटी जाती है। हमें ईश्वर ने पुत्र न दिया; पर हम अपनी कुसुम को पाकर सन्तुष्ट थे और अपने भाग्य को धन्य मानते थे। उसे कितने लाड़-प्यार से पाला, कभी उसे फूल की छड़ी से भी न छुआ। उसकी शिक्षा-दीक्षा में कोई बात उठा न रखी। उसने बी.ए. नहीं पास किया, लेकिन विचारों की प्रौढ़ता और ज्ञान-विस्तार में किसी ऊँचे दर्जे की शिक्षित महिला से कम नहीं। आपने उसके लेख देखे हैं। मेरा ख्याल है, बहुत कम देवियाँ वैसे लेख लिख सकती हैं ! समाज, धर्म नीति सभी विषयों में उसके विचार बड़े परिष्कृत हैं। बहस करने में तो वह इतनी पटु है कि मुझे आश्चर्य होता है। गृह प्रबंध में इतनी कुशल कि मेरे घर का प्राय: सारा प्रबंध उसी के हाथ में था; किन्तु पति की दृष्टि में वह पाँव की धूल के बराबर भी नहीं। बार-बार पूछता हूँ, तूने उससे कुछ कह दिया है, या क्या बात है ? आख़िर, वह क्यों तुमसे इतना उदासीन है ?इसके जवाब में रोकर यही कहती है- ‘मुझसे तो उन्होंने कभी कोई बात ही नहीं की।’ मेरा विचार है कि पहले ही दिन दोनों में कुछ मनमुटाव हो गया। वह कुसुम के पास आया होगा। उसने मारे शर्म के जवाब न दिया होगा। संभव है, उससे दो-चार बातें और भी की हों। कुसुम ने सिर न उठाया होगा। आप जानते ही हैं, वह कितनी शर्मीली है। बस, पतिदेव रुठ गये होंगे। मैं तो कल्पना ही नहीं कर सकता कि कुसुम-जैसी बालिका से कोई पुरुष उदासीन रह सकता है, लेकिन दुर्भाग्य को कोई क्या करे ? दुखिया ने पति के नाम कई पत्र लिखे, पर उस निर्दयी ने एक का भी जवाब न दिया ! सारी चिट्ठियाँ लौटा दीं। मेरी समझ में नहीं आता कि उस पाषाण-हृदय को कैसे पिघलाऊँ। मैं अब खुद तो उसे कुछ लिख नहीं सकता। आप ही कुसुम की प्राण रक्षा करें, नहीं तो शीघ्र ही उसके जीवन का अन्त हो जायेगा और उसके हाथ हम दोनों प्राणी भी सिधार जायेंगे। उसकी व्यथा अब नहीं देखी जाती। नवीनजी की आँखें सजल हो गयीं। मुझे भी अत्यन्त क्षोभ हुआ। उन्हें तसल्ली देता हुआ बोला- आप इतने दिनों इस चिन्ता में पड़े रहे, मुझसे पहले ही क्यों न कहा ? मैं आज ही मुरादाबाद जाऊँगा और उस लौंडे की इस बुरी तरह खबर लूँगा कि वह भी याद करेगा। बचा तो जबरदस्ती घसीट लाऊँगा और कुसुम के पैरों में गिरा दूँगा। नवीनजी मेरे आत्मविश्वास पर मुसकराकर बोले-आप उससे क्या कहेंगे ? ‘यह न पूछिये ! वशीकरण के जितने मन्त्र हैं; उन सभी की परीक्षा करूँगा।’‘तो आप कदापि सफल न होंगे। वह इतना शीलवान, इतना विनम्र, इतना प्रसन्न-मुख है, इतना मधुर-भाषी की आप वहाँ से उसके भक्त होकर लौटेंगे ! वह नित्य आपके सामने हाथ बाँधे खड़ा रहेगा। आपकी सारी कठोरता शान्त हो जायेगी। आपके लिए तो एक ही साधन है। आपके कलम में जादू है ! आपने कितने ही युवकों को सन्मार्ग पर लगाया है। हृदय में सोई हुई मानवता को जगाना आपका कर्त्तव्य है। मैं चाहता हूँ, आप कुसुम की ओर से ऐसा करुणा-जनक, ऐसा दिल हिला देनेवाला पत्र लिखें कि वह लज्जित हो जाये और उसकी प्रेम-भावना सचेत हो उठे। मैं जीवन-पर्यन्त आपका आभारी रहूँगा।’नवीनजी कवि तो ही ठहरे। इस तजबीज में वास्तविकता की अपेक्षा कवित्व ही की प्रधानता थी। आप मेरे कई गल्पों को पढ़कर रो पड़े हैं, इससे आपको विश्वास हो गया है कि मैं चतुर सँपेरे की भाँति जिस दिल को चाहूँ, नचा सकता हूँ। आपको यह मालूम नहीं कि सभी मनुष्य कवि नहीं होते, और न एक-से भावुक। जिन गल्पों को पढ़कर आप रोये हैं, उन्हीं गल्पों को पढ़कर कितने ही सज्जनों ने विरक्त होकर पुस्तक फेंक दी हैं। पर इन बातों का वह अवसर न था। वह समझते हैं कि मैं अपना गला छुड़ाना चाहता हूँ, इसलिए मैंने सहृदयता से कहा- आपको बहुत दूर की सूझी। और मैं उस प्रस्ताव से सहमत हूँ और यद्यपि आपने मेरी करुणोत्पादक शक्ति का अनुमान करने में अत्युक्ति से काम लिया है; लेकिन मैं आपको निराश न करूँगा। मैं पत्र लिखूँगा और यथाशक्ति उस युवक की न्याय-बुद्धि को जगाने की चेष्टा भी करूँगा, लेकिन आप अनुचित न समझें तो पहले मुझे वह पत्र दिखा दें, जो कुसुम ने अपने पति के नाम लिखे थे, उसने पत्र तो लौटा ही दिये हैं और यदि कुसुम ने उन्हें फाड़ नहीं डाला है, तो उसके पास होंगे। उन पत्रों को देखने से मुझे ज्ञात हो पायेगा कि किन पहलुओं पर लिखने की गुंजाइश बाक़ी है।नवीनजी ने जेब से पत्रों का एक पुलिन्दा निकालकर मेरे सामने रख दिया और बोले- मैं जानता था आप इन पत्रों को देखना चाहेंगे, इसलिए इन्हें साथ लेता आया। आप इन्हें शौक से पढ़ें। कुसुम जैसी लड़की है, वैसे ही आपकी भी लड़की है। आपसे क्या परदा !सुगन्धित, गुलाबी, चिकने कागज पर बहुत ही सुन्दर अक्षरों में लिखे उन पत्रों को मैंने पढ़ना शुरू किया-मेरे स्वामी, मुझे यहाँ आये एक सप्ताह हो गया; लेकिन आँखें पल भर के लिए भी नहीं झपकीं। सारी रात करवटे बदलते बीत जाती है। बार-बार सोचती हूँ, मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ कि उसकी आप मुझे यह सजा दे रहे हैं, आप मुझे झिड़कें; घुड़कें, कोसें, इच्छा हो तो मेरे कान भी पकड़े। मैं इन सभी सजाओं को सहर्ष सह लूँगी; लेकिन यह निष्ठुरता नहीं सही जाती। मैं आपके घर एक सप्ताह रही। परमात्मा जानता है कि मेरे दिल में क्या-क्या अरमान थे। मैंने कितनी बार चाहा कि आपसे कुछ पूछूँ; आपसे अपने अपराधों को क्षमा कराऊँ; लेकिन आप मेरी परछाईं से भी दूर भागते थे। मुझे कोई अवसर न मिला। आपको याद होगा कि जब दोपहर को सारा घर सो जाता था; तो मैं आपके कमरे में जाती थी और घण्टों सिर झुकाये खड़ी रहती थी; पर आपने कभी आँख उठाकर न देखा। उस वक्त मेरे मन की क्या दशा होती थी, इसका कदाचित् आप अनुमान न कर सकेंगे। मेरी जैसी अभागिनी स्त्रियाँ इसका कुछ अन्दाज़ कर सकती हैं। मैंने अपनी सहेलियों से उनकी सोहागरात की कथाएँ सुन-सुनकर अपनी कल्पना में सुखों का जो स्वर्ग बनाया था उसे आपने कितनी निर्दयता से नष्ट कर दिया !मैं आपसे से पूछती हूँ, क्या आपके ऊपर मेरा कोई अधिकार नहीं है ? अदालत भी किसी अपराधी को दंड देती है, तो उस पर कोई-न-कोई अभियोग लगाती है, गवाहियां लेती है, उनका बयान सुनती है। आपने तो कुछ पूछा ही नहीं। मुझे अपनी ख़ता मालूम हो जाती, तो आगे के लिए सचेत हो जाती। आपके चरणों पर गिरकर कहती, मुझे क्षमादान दो। मैं शपथपूर्वक कहती हूँ, मुझे कुछ नहीं मालूम, आप क्यों रुष्ट हो गये। संभव है, आपने अपनी पत्नी में जिन गुणों को देखने की कामना की हो, वे मुझमें न हो। बेशक मैं अँगरेज़ी नहीं पढ़ी, अँगरेज़ी-समाज की रीति-नीति से परिचित नहीं, अँगरेज़ी खेल ही खेलना जानती हूँ। और भी कितनी त्रुटियाँ मुझमें होंगी। मैं जानती हूँ कि मैं आपके योग्य न थी। आपको मुझसे कहीं अधिक रूपवती, गुणवती, बुद्धिमती स्त्री मिलनी चाहिए थी; लेकिन मेरे देवता, दंड अपराधों को मिलना चाहिए, त्रुटियों को नहीं। फिर मैं तो आपके इशारे पर चलने को तैयार हूँ। आप मेरी दिलजोई करें, फिर देखिए, मैं अपनी त्रुटियों को कितनी जल्द पूरा कर लेती हूँ। आपका प्रेम-कटाक्ष मेरे रूप को प्रदीप्त, मेरी बुद्धि को तीव्र और मेरे भाग्य को बलवान कर देगा। वह विभूति पाकर मेरी कायाकल्प हो जायेगी।स्वामी ! क्या आपने सोचा है ? आप यह क्रोध किस पर कर रहे हैं ? वह अबला, जो आपके चरणों पर पड़ी हुई आपसे क्षमा-दान माँग रही है, जो जन्म-जन्मान्तर के लिए आपकी चेरी है, क्या इस क्रोध को सहन कर सकती है ? मेरा दिल बहुत कमजोर है। मुझे रुलाकर आपको तो पश्चाताप के सिवा और कुछ हाथ न आयेगा। इस क्रोधाग्नि की एक चिनगारी मुझे भस्म कर देने के लिए काफी है, अगर आपकी यह इच्छा है कि मैं मर जाऊँ, तो मैं मरने के लिए तैयार हूँ; केवल आपका इशारा चाहती हूँ। अगर मरने से आपका चित्त प्रसन्न हो, तो मैं बड़े हर्ष से अपने को आपके चरणों पर समर्पित कर दूँगी; मगर इतना कहे बिना नहीं रहा जाता कि मुझमें सौ ऐब हों, पर एक गुण भी है- मुझे दावा है कि आपकी जितनी सेवा मैं कर सकती हूँ, उतनी कोई दूसरी स्त्री नहीं कर सकती। आप विद्वान हैं, उदार हैं, मनोविज्ञान के पंडित हैं, आपकी लौंडी आपके सामने खड़ी दया की भीख माँग रही है। क्या उसे द्वार से ठुकरा दीजिएगा ?
आपकी अपराधिनीकुसुम
यह पत्र पढ़कर मुझे रोमांच हो आया। यह बात मेरे लिए असह्य थी कि कोई स्त्री अपने पति की इतनी खुशामद करने पर मजबूर हो जाय। पुरुष अगर स्त्री से उदासीन रह सकता है, तो स्त्री उसे क्यों नहीं ठुकरा सकती ? वह दुष्ट समझता है कि विवाह ने एक स्त्री को उसका गुलाम बना दिया। वह उस अबला पर जितना अत्याचार चाहे करे, कोई उसका हाथ नहीं पकड़ सकता, कोई चूँ भी नहीं सकर सकता। पुरुष अपनी दूसरी, तीसरी, चौथी शादी कर सकता है, स्त्री से कोई संबंध न रखकर भी उस पर उसी कठोरता से शासन कर सकता है। वह जानता है कि स्त्री कुल-मर्यादा के बंधनों में जकड़ी हुई है, उसे रो-रोकर मर जाने के सिवा और कोई उपाय नहीं है। अगर उसे भय होता कि औरत भी उसकी ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, ईंट से भी नहीं; केवल थप्पड़ से दे सकती है, तो उसे कभी इस बदमिज़ाजी का साहस न होता। बेचारी स्त्री कितनी विवश है। शायद मैं कुसुम की जगह होता, तो इस निष्ठुरता का जवाब इसकी दस गुनी कठोरता से देता। उसकी छाती पर मूँग दलता ? संसार के हँसने की जरा भी चिन्ता न करता। समाज अबलाओं पर इतना जुल्म देख सकता है और चूँ तक नहीं करता, उसके रोने या हँसने की मुझे ज़रा भी परवाह न होती। अरे अभागे युवक ! तुझे खबर नहीं, तू अपने भविष्य की गर्दन पर कितनी बेदर्दी से छुरी फेर रहा है ? यह वह समय है, जब पुरुष को अपने प्रणय-भण्डार से स्त्री के माता-पिता, भाई-बहन, सखियाँ-सहेलियाँ, सभी के प्रेम की पूर्ति करनी पड़ती है। अगर पुरुष में यह सामर्थ्य नहीं है तो स्त्री की क्षुधित आत्मा को कैसे संतुष्ट रख सकेगा। परिणाम वही होगा, जो बहुधा होता है। अबला कुढ़-कुढ़कर मर जाती है। यही वह समय है, जिसकी स्मृति जीवन में सदैव के लिये मिठास पैदा कर देती है। स्त्री की प्रेमसुधा इतनी तीव्र होती है कि वह पति का स्नेह पाकर अपना जीवन सफल समझती है और इस प्रेम के आधार पर जीवन के सारे कष्टों को हँस-खेलकर सह लेती है। यही वह समय है, जब हृदय में प्रेम का वसन्त आता है और उसमें नयी-नयी आशा-कोपलें निकलने लगती हैं। ऐसा कौन निर्दयी है, जो इस ऋतु में उस वृक्ष पर कुल्हाड़ी चलायेगा ! यही वह समय है, जब शिकारी किसी पक्षी को उसके बसेरे से लाकर पिंजरे में बन्द कर देता है। क्या वह उसकी गर्दन पर छुरी चलाकर उसका मधुर गान सुनने की आशा रखता है ?
Wednesday, June 17, 2009
मानसरोवर -1
अलग्योझा
भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिए बुरे दिन आ गये। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गाँव में गुल्ली- डंडा खेलता फिरता था। माँ के आते ही चक्की में जुटना पड़ा। पन्ना रूपवती स्त्री थी और रूप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई मोटा काम न करती। गोबर रग्घू निकालता, बैलों को सानी रग्घू देता। रग्घू ही जूठे बरतन माँजता। भोला की आँखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे अब रग्घू में सब बुराइयाँ-ही-बुराइयाँ नजर आतीं। पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार आँखें बन्द जरा भी परवाह न करता।नतीजा यह हुआ कि रग्घू करके मान लेता था। रग्घू की शिकायतों की जरा भी परवाह न करता। नतीजा यह हुआ कि रग्घू ने शिकायत करना छोड़ दिया। किसके सामने रोये ? बाप ही नहीं, सारा गाँव उसका दुश्मन था। बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुछ समझता ही नहीं, बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती पिलाती है। यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहो, पन्ना इतनी सीधी-सादी है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता। रग्घू का हृदय माँ की ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहाँ तक कि आठ साल गुजर गये। और एक दिन भोला के नाम मृत्यु का सन्देश आ पहुँचा। पन्ना के चार बच्चे थे-तीन बेटे और एक बेटी। इतना बड़ा खर्च और कमानेवाला कोई नहीं। रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा। यह मानी हुई बात थी। अपनी स्त्री लायेगा और अलग रहेगा। स्त्री आकर और भी आग लगायेगी। पन्ना के चारों ओर अंधेरा-ही-अंधेरा दिखाई देता था। पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में न रहेगी। जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गुलाम समझा, उसका मुँह न ताकेगी। वह सुन्दर थी, अवस्था भी कुछ ऐसी ज्यादा न थी। जवानी अपनी पूरी बाहर पर थी। क्या वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकतीं ? यही न होगा लोग हँसेंगे। बला से ! उसकी विरादरी में क्या ऐसा होता नहीं। ब्राह्मण ठाकुर थोड़े ही थी कि नाक कट जायगी यह तो ऊँची जातों में होता है कि घर में चाहे जो कुछ करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को दिखाकर दूसरा घर कर सकती है। फिर वह रग्घू की दबैल बनकर क्यों रहे ?भोला को मरे एक महीना गुजर चुका था। संध्या हो गई थी। पन्ना इसी चिन्ता में पड़ी हुई थी कि सहसा उसे खयाल आया, लड़के घर में नहीं हैं। यह बैलों की लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके नीचे न आ जाय। अब द्वार पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा। घर से बाहर निकली, तो देखा रग्घू सामने झोंपड़े में बैठा ऊख की गँडेरियाँ बना रहा है, तीनों लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर रही है। पन्ना को अपनी आँखों पर विश्वास न आया। आज तो यह नई बात है ! शायद दुनिया को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूँ और मन में छुरी रक्खी हुई है। घात मिले तो जान ही ले ले। काला साँप है, काला साँप। कठोर स्वर में बोली-तुम सब के सब वहाँ क्या करते हो ? घर में आओ, साँझ की बेला है, गोरू आते होंगे। रग्घू ने विनीत नेत्रों से देखकर कहा-मैं तो हूँ ही काकी, डर किस बात का है ?बड़ा लड़का केदार बोला-काकी रग्घू दादा ने हमारे लिए दो गाड़ियाँ बना दी हैं। यह देख, एक पर हम और खुन्नू बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और झुनिया। दादा दोनों गाड़ियाँ खींचेंगे। यह कहकर वह कोने से छोटी-छोटी गाड़ियाँ निकाल लाया, चार-चार पहिए लगे थे, बैठने के लिए तख्ते और रोक के लिए दोनों तरफ बाजू थे। पन्ना ने आश्चर्य से पूछा-ये गाड़ियाँ किसने बनायीं ?केदार ने चिढ़कर कहा-रग्घू दादा ने बनायी हैं, और किसने। भगत के घर से बसूला और रूखानी माँग लाये और झटपट बना दीं। खूब दौड़ती हैं काकी, बैठ खुन्नू, मैं खींचूँ। खुन्नू गाड़ी में बैठ गया। केदार खींचने लगा। चर-चर का शोर हुआ, मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़के के साथ शरीक है। लछमन ने दूसरी गाड़ी पर बैठकर कहा-दादा खींचो। रग्घू ने झुनिया को भी गाड़ी में बैठा दिया और गाड़ी खींचता हुआ दौड़ा। तीनों लड़के तालियाँ बजाने लगे। पन्ना चकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी और सोच रही थी कि यह वही रग्घू है या और। थोड़े देर के बाद दोनों गाड़ियाँ लौटी; लड़के घर में आकर इस यान-यात्रा के अनुभव बयान करने लगे। कितने खुश थे सब, मानों हवाई जहाज पर बैठ आये हों। खुन्नू ने कहा-काकी सच, पेड़ दौड़ रहे थे। लछमन-और बछिया कैसी भागीं सब-की-सब दौड़ीं। केदार-काकी, रग्घू दादा दोनों गाड़ियाँ एक साथ खींच ले जाते हैं। झुनिया सबसे छोटी थी। उसका व्यंजनाशक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परमित थी-तालियाँ बजा बजाकर नाच रही थी। खुन्नू-अब हमारे घर गाय भी आ जायेगी काकी। रग्घू दादा ने गिरधारी से कहा है कि हमें गाय ला दो। गिरधारी बोला-कल लाऊँगा। केदार-तीन सेर दूध देती है काकी। खूब दूध पीयेंगे।इतने में रग्घू भी अन्दर आ गया। पन्ना ने अवहेलना की दृष्टि से देखकर पूछा-क्यों रग्घू तुमने गिरधारी से कोई गाय माँगी है ?रग्घू ने क्षमा प्रार्थना के भाव से कहा-हाँ माँगी तो है, कल लावेगा। पन्ना रुपये किसके घर से आयेंगे ? यह भी सोचा है। रग्घू-सब सोच लिया है काकी। मेरी यह मुहर नहीं है। इसके पच्चीस रुपये मिल रहे है पाँच रुपये बछिया के मुजरा दे दूँगा। बस गाय अपनी हो जायेगी। पन्ना सन्नाटे में आ गयी। अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार न कर सका। बोली-मुहर को क्यों बेचे देते हो। गाय की अभी कौन जल्दी है। हाथ में पैसे हो जायँ। तो ले लेना। सूना-सूना गला अच्छा न लगेगा। इतने दिनों गाय नहीं रही तो क्या लड़के नहीं जिये ?रग्घू दार्शनिक भाव से बोला-बच्चों के खाने-पीने के यही दिन हैं काकी। इस उम्र में न खाया, तो फिर क्या खायेंगे। मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नहीं मालूम होता, लोग समझते होंगे कि बाप तो मर गया, इसे मुहर पहनने की सूझी है। भोला महतो तो गाय की चिन्ता ही में चल बसे, न रुपये आये और न गाय मिली, मजबूर थे। रग्घू ने वह समस्या कितनी सुगमता से हल कर दी। आज जीवन में पहली बार, पन्ना को रग्घू पर विश्वास आया, बोली-जब गहना ही बेचना है, तो अपनी मुहर क्यों बेचोगे। मेरी हँसली ले लेना। रग्घू-नहीं काकी ! वह तुम्हारे गले में बहुत अच्छी लगती है। मर्दों को क्या मुहर पहने या न पहने। पन्ना-चल, मैं बूढ़ी हुई। मुझे अब हँसली पहनकर क्या करना है। तू अभी लड़का है, तेरा सूना गला अच्छा न लगेगा। रग्घू मुस्करा कर बोला-तुम अभी से कैसे बूढ़ी हो गयी ? गाँव में, कौन तुम्हारे बराबर है ?रग्घू की सरल आलोचना ने पन्ना को लज्जित कर दिया। उसके रुखे मुरझाये मुख पर प्रसन्नता की लाली दौड़ गयी।
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पाँच साल गुजरे गये। रग्घू का- सा मेहनती ईमानदार बात का धनी दूसरा किसान गाँव में न था। पन्ना की इच्छा के बिना कोई काम न करता। उसकी उम्र अब 23 साल की हो गयी थी। पन्ना बार-बार कहती भइया बहू को बिदा करा लाओ। कब तक नैहर में पड़ी रहेगी। सब लोग मुझी को बदनाम करते हैं कि यही बहू को नहीं आने देती, मगर रग्घु टाल देता था। कहता था कि अभी जल्दी क्या है। उसे अपनी स्त्री के रंग-ढंग का कुछ परिचय दूसरों से मिल चुका था। ऐसी औरत को घर में लाकर वह अपनी शान्ति में बाधा नहीं डालना चाहता था। आखिर एक दिन पन्ना ने जिद करके कहा-तो तुम न लाओगे ?‘कह दिया कि अभी कोई जल्दी नहीं है।’‘तुम्हारे लिए जल्दी न होगी, मेरे लिए जल्दी है। मैं आज आदमी भेजती हूँ।’‘पछताओगी काकी उसका मिजाज अच्छा नहीं है।’‘तुम्हारी बला से। जब मैं उससे बोलूगी ही नहीं तो क्या हवा से लड़ेगी। रोटियाँ तो बना लेगी। मुझसे भीतर बाहर का सारा काम नहीं होता, मैं आज बुलाये लेती हूँ ?’‘बुलाना चाहती हो, बुला लो; मगर फिर यह न कहना कि यह मेहरिया को ठीक नहीं करता उसका गुलाम हो गया।’‘न कहूँगी, जाकर दो साड़ियाँ और मिठाई ले आ।’तीसरे दिन मुलिया मैके से आ गई। दरवाजे पर नगाड़े बजे। शहनाइयों की मधुर ध्वनि आकाश में गूँजने लगी। मुँह दिखावे की रस्म अदा हुई। वह इस मरुभूमि में निर्मल जल- धरा थी। गेहुँआ रंग था, बड़ी-बड़ी नोकीली पलकें, कपोलों पर हल्की सुर्खी, आँखों में प्रबल आकर्षण रग्घू उसे देखते ही मन्त्र- मुग्ध हो गया। प्रातःकाल पानी का घड़ा लेकर चलती, तब उसका गेहुँआ रंग प्रभात की सुनहली किरणों से कुन्दन हो जाता, मानो उषा अपनी सारी सुगन्ध सारा विकास और सारा उन्माद लिए मुसकराती चली जाती हो।
3
मुलिया मैके से ही जली भुनी आयी थी, मेरा शौहर छाती फाड़कर काम करे और पन्ना रानी बनी बैठी रहे, उसके लड़के रईसजादे बने घूमें। मुलिया से यह बरदाश्त न होगा। वह किसी की गुलामी न करेगी। अपने लड़के तो अपने ही होते ही नहीं, भाई किसके होते हैं। जब तक पर नहीं निकलते हैं, रग्घू को घेरे हुए हैं। ज्योंही जरा सयाने हुये, पर झाड़कर निकल जायँगे। बात भी न पूछेंगे। उस दिन उसने रग्घू से कहा-तुम्हें इस तरह गुलामी करनी हो तो करो मुझसे न होगी। रग्घू तो फिर क्या करूँ, तू ही बता ? लड़के तो अभी घर का काम करने लायक भी नहीं है।मुलिया-लड़के रावत के हैं, कुछ तुम्हारे नहीं हैं। यही पन्ना है, जो तुम्हें दाने-दाने को तरसाती थी। सब सुन चुकी हूँ। मैं लौंडी बनकर न रहूँगी। रुपये पैसे का मुझे कुछ हिसाब नहीं मिलता। न जाने तुम क्या लाते हो ? और वह क्या करती है। तुम समझते हो रुपए घर ही में तो हैं; मगर देख लेना, तुम्हें जो एक फूटी कौड़ी भी मिले। रग्घू- रुपए- पैसे तेरे हाथ में देने लगूँ, तो दुनिया क्या कहेगी यह तो सोच। मुलिया- दुनिया जो चाहे कहे। दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूँ। देख लेना, भाड़ लीपकर हाथ काला ही रहेगा। फिर तुम अपने भाइयों के लिए मरो, मैं क्यों मरूँ। रग्घू ने जवाब न दिया-उसे जिस बात का भय था, वह इतनी जल्द सिर पर आ पड़ी। अब अगर उसने बहुत तथ्योंथंभी किया, तो साल छः महीने और काम चलेगा। बस आगे यह डोंगा चलता नजर नहीं आता। बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी ?एक दिन पन्ना ने मुहए का सुखावन डाला। बरसात शुरू हो गई थी। बुखार में अनाज गीला हो रहा था। मुलिया से बोली-बहू, जरा देखती रहना, मैं तालाब से नहा आऊँ। मुलिया ने लापरवाही से कहा-मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो, एक दिन न नहाओगी तो क्या होगा। पन्ना ने साड़ी उठाकर रख दी, नहाने न गई। मुलिया का वार खाली गया। कई दिन के बाद एक शाम को पन्ना धान रोपकर लौटी, अंधेरा हो गया था। दिन भर की भूखी थी, आशा थी, बहू ने रोटी बना रखी होगी, मगर देखा तो यहाँ चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ था, और बच्चे मारे भूख के तड़प रहे थे। मुलिया से आहिस्ते से पूछा-आज अभी चूल्हा नहीं जला ?केदार ने कहा-आज दोपहर को भी चूल्हा नहीं जला काकी। भाभी ने कुछ बनाया ही नहीं। पन्ना-तो तुमलोगों ने खाया क्या ?केदार- कुछ नहीं, रात की रोटियाँ थीं, खुन्नू और लछमन ने खायीं। मैंने सत्तू खा लिया। पन्ना और बहू ?केदार- वह तो पड़ी सो रही है, कुछ नहीं खाया। पन्ना ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गयी। आटा गूँधती थी और रोती थी। क्या नसीब है, दिन भर खेत में जली, घर आई तो चूल्हे के सामने जलना पड़ा।केदार का चौदहवाँ साल था। भाभी के रंग-ढंग देखकर सारी स्थिति समझ रहा था। बोला-काकी भाभी अब तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती। पन्ना ने चौंककर पूछा-क्या कुछ कहती थी ?केदार- कहती कुछ नहीं थी; मगर है उसके मन में यही बात। फिर तुम क्यों नहीं छोड़ देतीं ? जैसे चाहे रहे; हमारा भी भगवान है। पन्ना ने दाँतों से जीभ दबाकर कहा-चुप, मेरे सामने ऐसी बात भूलकर भी न कहना। रग्घू तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा बाप है। मुलिया से कभी बोलेगे, तो समझ लेना जहर खा लूँगी।
4
दशहरे का त्योहार आया। उस गाँव से कोस भर पर एक पुरवे में मेला लगता था। गाँव के सब लड़के मेला देखने चले। पन्ना भी लड़कों के साथ चलने को तैयार हुई; मगर पैसे कहाँ से आयें ? कुंजी तो मुलिया के पास थी। रग्घू ने आकर मुलिया से कहा-लड़के मेले जा रहे है, सबों को दो-दो आने पैसे दे दे। मुलिया ने त्योरिया चढ़ाकर कहा-पैसे गर में नहीं हैं।रग्घू अभी तो तेलहन बिका था, क्या इतनी जल्दी रुपये उठ गये ?मुलिया- हाँ, उठ गये। रग्घू- कहाँ उठ गये ? जरा सुनूँ, आज त्योहार के दिन लड़के मेला देखने न जायँगे। मुलिया- अपनी काकी से कहो, पैसे निकालें, गाड़कर क्या करेंगी। खूँटी पर कुंजी लटक रही थी। रग्घू ने कुंजी उतारी और चाहा कि संदूक खोले कि मुलिया ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली-कुंजी मुझे दे दो, नहीं तो ठीक न होगा। खाने पहनने को भी चाहिए, कागज किताब को भी चाहिए, उस पर मेला देखने को भी चाहिए। हमारी कमाई इसलिये नहीं है कि दूसरे खायँ और मूँछों पर ताव दें। पन्ना ने रग्घू से कहा-भइया, पैसे क्या होंगे। लड़के मेला देखने न जायँगे। रग्घू ने झिड़ककर कहा- मेला देखने क्यों न जायँगे ? सारा गाँव जा रहा है। हमारे ही लड़के न जायँगे।यह कहकर रग्घू ने अपना हाथ छुड़ा लिया और पैसे निकालकर लड़कों को दे दिये; मगर कुंजी जब मुलिया को देने लगा, तब उसने उसे आँगन में फेंक दिया और मुँह लपेटकर लेट गया। लड़के मेला देखने न गये।
भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिए बुरे दिन आ गये। रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी। चैन से गाँव में गुल्ली- डंडा खेलता फिरता था। माँ के आते ही चक्की में जुटना पड़ा। पन्ना रूपवती स्त्री थी और रूप और गर्व में चोली-दामन का नाता है। वह अपने हाथों से कोई मोटा काम न करती। गोबर रग्घू निकालता, बैलों को सानी रग्घू देता। रग्घू ही जूठे बरतन माँजता। भोला की आँखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे अब रग्घू में सब बुराइयाँ-ही-बुराइयाँ नजर आतीं। पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार आँखें बन्द जरा भी परवाह न करता।नतीजा यह हुआ कि रग्घू करके मान लेता था। रग्घू की शिकायतों की जरा भी परवाह न करता। नतीजा यह हुआ कि रग्घू ने शिकायत करना छोड़ दिया। किसके सामने रोये ? बाप ही नहीं, सारा गाँव उसका दुश्मन था। बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुछ समझता ही नहीं, बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती पिलाती है। यह उसी का फल है। दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता। वह तो कहो, पन्ना इतनी सीधी-सादी है कि निबाह होता जाता है। सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता। रग्घू का हृदय माँ की ओर से दिन-दिन फटता जाता था। यहाँ तक कि आठ साल गुजर गये। और एक दिन भोला के नाम मृत्यु का सन्देश आ पहुँचा। पन्ना के चार बच्चे थे-तीन बेटे और एक बेटी। इतना बड़ा खर्च और कमानेवाला कोई नहीं। रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा। यह मानी हुई बात थी। अपनी स्त्री लायेगा और अलग रहेगा। स्त्री आकर और भी आग लगायेगी। पन्ना के चारों ओर अंधेरा-ही-अंधेरा दिखाई देता था। पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में न रहेगी। जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी। जिस लौंडे को अपना गुलाम समझा, उसका मुँह न ताकेगी। वह सुन्दर थी, अवस्था भी कुछ ऐसी ज्यादा न थी। जवानी अपनी पूरी बाहर पर थी। क्या वह कोई दूसरा घर नहीं कर सकतीं ? यही न होगा लोग हँसेंगे। बला से ! उसकी विरादरी में क्या ऐसा होता नहीं। ब्राह्मण ठाकुर थोड़े ही थी कि नाक कट जायगी यह तो ऊँची जातों में होता है कि घर में चाहे जो कुछ करो, बाहर परदा ढका रहे। वह तो संसार को दिखाकर दूसरा घर कर सकती है। फिर वह रग्घू की दबैल बनकर क्यों रहे ?भोला को मरे एक महीना गुजर चुका था। संध्या हो गई थी। पन्ना इसी चिन्ता में पड़ी हुई थी कि सहसा उसे खयाल आया, लड़के घर में नहीं हैं। यह बैलों की लौटने की बेला है, कहीं कोई लड़का उनके नीचे न आ जाय। अब द्वार पर कौन है, जो उनकी देखभाल करेगा। घर से बाहर निकली, तो देखा रग्घू सामने झोंपड़े में बैठा ऊख की गँडेरियाँ बना रहा है, तीनों लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर रही है। पन्ना को अपनी आँखों पर विश्वास न आया। आज तो यह नई बात है ! शायद दुनिया को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूँ और मन में छुरी रक्खी हुई है। घात मिले तो जान ही ले ले। काला साँप है, काला साँप। कठोर स्वर में बोली-तुम सब के सब वहाँ क्या करते हो ? घर में आओ, साँझ की बेला है, गोरू आते होंगे। रग्घू ने विनीत नेत्रों से देखकर कहा-मैं तो हूँ ही काकी, डर किस बात का है ?बड़ा लड़का केदार बोला-काकी रग्घू दादा ने हमारे लिए दो गाड़ियाँ बना दी हैं। यह देख, एक पर हम और खुन्नू बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और झुनिया। दादा दोनों गाड़ियाँ खींचेंगे। यह कहकर वह कोने से छोटी-छोटी गाड़ियाँ निकाल लाया, चार-चार पहिए लगे थे, बैठने के लिए तख्ते और रोक के लिए दोनों तरफ बाजू थे। पन्ना ने आश्चर्य से पूछा-ये गाड़ियाँ किसने बनायीं ?केदार ने चिढ़कर कहा-रग्घू दादा ने बनायी हैं, और किसने। भगत के घर से बसूला और रूखानी माँग लाये और झटपट बना दीं। खूब दौड़ती हैं काकी, बैठ खुन्नू, मैं खींचूँ। खुन्नू गाड़ी में बैठ गया। केदार खींचने लगा। चर-चर का शोर हुआ, मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़के के साथ शरीक है। लछमन ने दूसरी गाड़ी पर बैठकर कहा-दादा खींचो। रग्घू ने झुनिया को भी गाड़ी में बैठा दिया और गाड़ी खींचता हुआ दौड़ा। तीनों लड़के तालियाँ बजाने लगे। पन्ना चकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी और सोच रही थी कि यह वही रग्घू है या और। थोड़े देर के बाद दोनों गाड़ियाँ लौटी; लड़के घर में आकर इस यान-यात्रा के अनुभव बयान करने लगे। कितने खुश थे सब, मानों हवाई जहाज पर बैठ आये हों। खुन्नू ने कहा-काकी सच, पेड़ दौड़ रहे थे। लछमन-और बछिया कैसी भागीं सब-की-सब दौड़ीं। केदार-काकी, रग्घू दादा दोनों गाड़ियाँ एक साथ खींच ले जाते हैं। झुनिया सबसे छोटी थी। उसका व्यंजनाशक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परमित थी-तालियाँ बजा बजाकर नाच रही थी। खुन्नू-अब हमारे घर गाय भी आ जायेगी काकी। रग्घू दादा ने गिरधारी से कहा है कि हमें गाय ला दो। गिरधारी बोला-कल लाऊँगा। केदार-तीन सेर दूध देती है काकी। खूब दूध पीयेंगे।इतने में रग्घू भी अन्दर आ गया। पन्ना ने अवहेलना की दृष्टि से देखकर पूछा-क्यों रग्घू तुमने गिरधारी से कोई गाय माँगी है ?रग्घू ने क्षमा प्रार्थना के भाव से कहा-हाँ माँगी तो है, कल लावेगा। पन्ना रुपये किसके घर से आयेंगे ? यह भी सोचा है। रग्घू-सब सोच लिया है काकी। मेरी यह मुहर नहीं है। इसके पच्चीस रुपये मिल रहे है पाँच रुपये बछिया के मुजरा दे दूँगा। बस गाय अपनी हो जायेगी। पन्ना सन्नाटे में आ गयी। अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार न कर सका। बोली-मुहर को क्यों बेचे देते हो। गाय की अभी कौन जल्दी है। हाथ में पैसे हो जायँ। तो ले लेना। सूना-सूना गला अच्छा न लगेगा। इतने दिनों गाय नहीं रही तो क्या लड़के नहीं जिये ?रग्घू दार्शनिक भाव से बोला-बच्चों के खाने-पीने के यही दिन हैं काकी। इस उम्र में न खाया, तो फिर क्या खायेंगे। मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नहीं मालूम होता, लोग समझते होंगे कि बाप तो मर गया, इसे मुहर पहनने की सूझी है। भोला महतो तो गाय की चिन्ता ही में चल बसे, न रुपये आये और न गाय मिली, मजबूर थे। रग्घू ने वह समस्या कितनी सुगमता से हल कर दी। आज जीवन में पहली बार, पन्ना को रग्घू पर विश्वास आया, बोली-जब गहना ही बेचना है, तो अपनी मुहर क्यों बेचोगे। मेरी हँसली ले लेना। रग्घू-नहीं काकी ! वह तुम्हारे गले में बहुत अच्छी लगती है। मर्दों को क्या मुहर पहने या न पहने। पन्ना-चल, मैं बूढ़ी हुई। मुझे अब हँसली पहनकर क्या करना है। तू अभी लड़का है, तेरा सूना गला अच्छा न लगेगा। रग्घू मुस्करा कर बोला-तुम अभी से कैसे बूढ़ी हो गयी ? गाँव में, कौन तुम्हारे बराबर है ?रग्घू की सरल आलोचना ने पन्ना को लज्जित कर दिया। उसके रुखे मुरझाये मुख पर प्रसन्नता की लाली दौड़ गयी।
2
पाँच साल गुजरे गये। रग्घू का- सा मेहनती ईमानदार बात का धनी दूसरा किसान गाँव में न था। पन्ना की इच्छा के बिना कोई काम न करता। उसकी उम्र अब 23 साल की हो गयी थी। पन्ना बार-बार कहती भइया बहू को बिदा करा लाओ। कब तक नैहर में पड़ी रहेगी। सब लोग मुझी को बदनाम करते हैं कि यही बहू को नहीं आने देती, मगर रग्घु टाल देता था। कहता था कि अभी जल्दी क्या है। उसे अपनी स्त्री के रंग-ढंग का कुछ परिचय दूसरों से मिल चुका था। ऐसी औरत को घर में लाकर वह अपनी शान्ति में बाधा नहीं डालना चाहता था। आखिर एक दिन पन्ना ने जिद करके कहा-तो तुम न लाओगे ?‘कह दिया कि अभी कोई जल्दी नहीं है।’‘तुम्हारे लिए जल्दी न होगी, मेरे लिए जल्दी है। मैं आज आदमी भेजती हूँ।’‘पछताओगी काकी उसका मिजाज अच्छा नहीं है।’‘तुम्हारी बला से। जब मैं उससे बोलूगी ही नहीं तो क्या हवा से लड़ेगी। रोटियाँ तो बना लेगी। मुझसे भीतर बाहर का सारा काम नहीं होता, मैं आज बुलाये लेती हूँ ?’‘बुलाना चाहती हो, बुला लो; मगर फिर यह न कहना कि यह मेहरिया को ठीक नहीं करता उसका गुलाम हो गया।’‘न कहूँगी, जाकर दो साड़ियाँ और मिठाई ले आ।’तीसरे दिन मुलिया मैके से आ गई। दरवाजे पर नगाड़े बजे। शहनाइयों की मधुर ध्वनि आकाश में गूँजने लगी। मुँह दिखावे की रस्म अदा हुई। वह इस मरुभूमि में निर्मल जल- धरा थी। गेहुँआ रंग था, बड़ी-बड़ी नोकीली पलकें, कपोलों पर हल्की सुर्खी, आँखों में प्रबल आकर्षण रग्घू उसे देखते ही मन्त्र- मुग्ध हो गया। प्रातःकाल पानी का घड़ा लेकर चलती, तब उसका गेहुँआ रंग प्रभात की सुनहली किरणों से कुन्दन हो जाता, मानो उषा अपनी सारी सुगन्ध सारा विकास और सारा उन्माद लिए मुसकराती चली जाती हो।
3
मुलिया मैके से ही जली भुनी आयी थी, मेरा शौहर छाती फाड़कर काम करे और पन्ना रानी बनी बैठी रहे, उसके लड़के रईसजादे बने घूमें। मुलिया से यह बरदाश्त न होगा। वह किसी की गुलामी न करेगी। अपने लड़के तो अपने ही होते ही नहीं, भाई किसके होते हैं। जब तक पर नहीं निकलते हैं, रग्घू को घेरे हुए हैं। ज्योंही जरा सयाने हुये, पर झाड़कर निकल जायँगे। बात भी न पूछेंगे। उस दिन उसने रग्घू से कहा-तुम्हें इस तरह गुलामी करनी हो तो करो मुझसे न होगी। रग्घू तो फिर क्या करूँ, तू ही बता ? लड़के तो अभी घर का काम करने लायक भी नहीं है।मुलिया-लड़के रावत के हैं, कुछ तुम्हारे नहीं हैं। यही पन्ना है, जो तुम्हें दाने-दाने को तरसाती थी। सब सुन चुकी हूँ। मैं लौंडी बनकर न रहूँगी। रुपये पैसे का मुझे कुछ हिसाब नहीं मिलता। न जाने तुम क्या लाते हो ? और वह क्या करती है। तुम समझते हो रुपए घर ही में तो हैं; मगर देख लेना, तुम्हें जो एक फूटी कौड़ी भी मिले। रग्घू- रुपए- पैसे तेरे हाथ में देने लगूँ, तो दुनिया क्या कहेगी यह तो सोच। मुलिया- दुनिया जो चाहे कहे। दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूँ। देख लेना, भाड़ लीपकर हाथ काला ही रहेगा। फिर तुम अपने भाइयों के लिए मरो, मैं क्यों मरूँ। रग्घू ने जवाब न दिया-उसे जिस बात का भय था, वह इतनी जल्द सिर पर आ पड़ी। अब अगर उसने बहुत तथ्योंथंभी किया, तो साल छः महीने और काम चलेगा। बस आगे यह डोंगा चलता नजर नहीं आता। बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी ?एक दिन पन्ना ने मुहए का सुखावन डाला। बरसात शुरू हो गई थी। बुखार में अनाज गीला हो रहा था। मुलिया से बोली-बहू, जरा देखती रहना, मैं तालाब से नहा आऊँ। मुलिया ने लापरवाही से कहा-मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो, एक दिन न नहाओगी तो क्या होगा। पन्ना ने साड़ी उठाकर रख दी, नहाने न गई। मुलिया का वार खाली गया। कई दिन के बाद एक शाम को पन्ना धान रोपकर लौटी, अंधेरा हो गया था। दिन भर की भूखी थी, आशा थी, बहू ने रोटी बना रखी होगी, मगर देखा तो यहाँ चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ था, और बच्चे मारे भूख के तड़प रहे थे। मुलिया से आहिस्ते से पूछा-आज अभी चूल्हा नहीं जला ?केदार ने कहा-आज दोपहर को भी चूल्हा नहीं जला काकी। भाभी ने कुछ बनाया ही नहीं। पन्ना-तो तुमलोगों ने खाया क्या ?केदार- कुछ नहीं, रात की रोटियाँ थीं, खुन्नू और लछमन ने खायीं। मैंने सत्तू खा लिया। पन्ना और बहू ?केदार- वह तो पड़ी सो रही है, कुछ नहीं खाया। पन्ना ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गयी। आटा गूँधती थी और रोती थी। क्या नसीब है, दिन भर खेत में जली, घर आई तो चूल्हे के सामने जलना पड़ा।केदार का चौदहवाँ साल था। भाभी के रंग-ढंग देखकर सारी स्थिति समझ रहा था। बोला-काकी भाभी अब तुम्हारे साथ रहना नहीं चाहती। पन्ना ने चौंककर पूछा-क्या कुछ कहती थी ?केदार- कहती कुछ नहीं थी; मगर है उसके मन में यही बात। फिर तुम क्यों नहीं छोड़ देतीं ? जैसे चाहे रहे; हमारा भी भगवान है। पन्ना ने दाँतों से जीभ दबाकर कहा-चुप, मेरे सामने ऐसी बात भूलकर भी न कहना। रग्घू तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा बाप है। मुलिया से कभी बोलेगे, तो समझ लेना जहर खा लूँगी।
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दशहरे का त्योहार आया। उस गाँव से कोस भर पर एक पुरवे में मेला लगता था। गाँव के सब लड़के मेला देखने चले। पन्ना भी लड़कों के साथ चलने को तैयार हुई; मगर पैसे कहाँ से आयें ? कुंजी तो मुलिया के पास थी। रग्घू ने आकर मुलिया से कहा-लड़के मेले जा रहे है, सबों को दो-दो आने पैसे दे दे। मुलिया ने त्योरिया चढ़ाकर कहा-पैसे गर में नहीं हैं।रग्घू अभी तो तेलहन बिका था, क्या इतनी जल्दी रुपये उठ गये ?मुलिया- हाँ, उठ गये। रग्घू- कहाँ उठ गये ? जरा सुनूँ, आज त्योहार के दिन लड़के मेला देखने न जायँगे। मुलिया- अपनी काकी से कहो, पैसे निकालें, गाड़कर क्या करेंगी। खूँटी पर कुंजी लटक रही थी। रग्घू ने कुंजी उतारी और चाहा कि संदूक खोले कि मुलिया ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली-कुंजी मुझे दे दो, नहीं तो ठीक न होगा। खाने पहनने को भी चाहिए, कागज किताब को भी चाहिए, उस पर मेला देखने को भी चाहिए। हमारी कमाई इसलिये नहीं है कि दूसरे खायँ और मूँछों पर ताव दें। पन्ना ने रग्घू से कहा-भइया, पैसे क्या होंगे। लड़के मेला देखने न जायँगे। रग्घू ने झिड़ककर कहा- मेला देखने क्यों न जायँगे ? सारा गाँव जा रहा है। हमारे ही लड़के न जायँगे।यह कहकर रग्घू ने अपना हाथ छुड़ा लिया और पैसे निकालकर लड़कों को दे दिये; मगर कुंजी जब मुलिया को देने लगा, तब उसने उसे आँगन में फेंक दिया और मुँह लपेटकर लेट गया। लड़के मेला देखने न गये।
Friday, June 5, 2009
वक्त गुजरता
वक्त गुजरता रहा पर साँसे थमी सी थी
मुस्कुरा रहे थे हम पर आंखों में नमी सी थी
साथ हमारे ये जहाँ था सारे
पर न जाने क्यों तुम्हारी कमी सी थी
ग़म में हँसनेवालों को कभी रुलाया नही जाता
लहरों से पानी को हटाया नही जाता
होने वाले हो जाते है ख़ुद ही दिल से अपने
किसी को कहकर अपना बनाया नही जाता
फूल से पहले खुसबू को तो देखो
करने से पहले काम को देखो
किसी के रूप में दीवाना न बनो
सूरत से पहले उसके दिल को भी देखो
अपने प्यार को छुपाना चाह पर छुपा न सके
दीवाने दिल पे काबू हम पा न सके
आज इतने करीब से गुजर गए वो
फिर भी उनका हाथ हम थाम न सके
इकरार में शब्दों की अहमियत नही होती
दिल के जज्बात की आवाज नही होती
आँखें बयान कर देती है दिल की दास्ताँ
मोहब्बत लफ्जो की मोहताज नही होती
गम की आहट न आए तेरे डर पर
प्यार के समुन्दर का तुम भी एक किनारा हो
भूल से जो टपके तेरी आंखों से मोटी
थामे वही जो तुम्हे सबसे प्यारा हो
मुस्कुरा रहे थे हम पर आंखों में नमी सी थी
साथ हमारे ये जहाँ था सारे
पर न जाने क्यों तुम्हारी कमी सी थी
ग़म में हँसनेवालों को कभी रुलाया नही जाता
लहरों से पानी को हटाया नही जाता
होने वाले हो जाते है ख़ुद ही दिल से अपने
किसी को कहकर अपना बनाया नही जाता
फूल से पहले खुसबू को तो देखो
करने से पहले काम को देखो
किसी के रूप में दीवाना न बनो
सूरत से पहले उसके दिल को भी देखो
अपने प्यार को छुपाना चाह पर छुपा न सके
दीवाने दिल पे काबू हम पा न सके
आज इतने करीब से गुजर गए वो
फिर भी उनका हाथ हम थाम न सके
इकरार में शब्दों की अहमियत नही होती
दिल के जज्बात की आवाज नही होती
आँखें बयान कर देती है दिल की दास्ताँ
मोहब्बत लफ्जो की मोहताज नही होती
गम की आहट न आए तेरे डर पर
प्यार के समुन्दर का तुम भी एक किनारा हो
भूल से जो टपके तेरी आंखों से मोटी
थामे वही जो तुम्हे सबसे प्यारा हो
Tuesday, January 6, 2009
कैसे करे मोहब्बत
निशान ऐ वक्त कभी मिटते नही दिल से ,
कैसे करे मोहब्बत किसी गाफिल* से (Careless)
हमें यारों की महफिल रास न आई,
फरेब करते रहे दोस्त वो मेरे फाजिल से ।
करते रहे गिला मुझसे हमसफ़र सभी,
गलती उनकी ये उम्मीद लगा बैठे जाहिल से ।
मुट्ठी में अश्कों की विरासत को लिए,
कब से लड़ते रहे अपने ही मुस्तकबिल* से । (Future)
मैं ही नही जहान में अधुरा ऐ खुदा,
हर तरफ़ दिखते हैं लोग नाकामिल* से ।(Incomplete)
न ख्वाब किसी अजनबी का करना जनाब तुम,
अपने भी कम नही, यहाँ किसी कातिल से ।
मैं तो लहर हूँ जिसे कहते हैं सच्चा प्यार,
टूट ही जाऊँगा, टकरा बेवफाई के साहिल से ।
तो कैसे कर ले मोहब्बत किसी गाफिल से ,
फरेब करते रहे दोस्त वो मेरे फाजिल से ।
चलते चलते
जलाते है बड़े शौक से दिलों में सच्चा प्यार,
एक दिन ख़तम हो जाता है इसका वजूद जल - जल के यार
कैसे करे मोहब्बत किसी गाफिल* से (Careless)
हमें यारों की महफिल रास न आई,
फरेब करते रहे दोस्त वो मेरे फाजिल से ।
करते रहे गिला मुझसे हमसफ़र सभी,
गलती उनकी ये उम्मीद लगा बैठे जाहिल से ।
मुट्ठी में अश्कों की विरासत को लिए,
कब से लड़ते रहे अपने ही मुस्तकबिल* से । (Future)
मैं ही नही जहान में अधुरा ऐ खुदा,
हर तरफ़ दिखते हैं लोग नाकामिल* से ।(Incomplete)
न ख्वाब किसी अजनबी का करना जनाब तुम,
अपने भी कम नही, यहाँ किसी कातिल से ।
मैं तो लहर हूँ जिसे कहते हैं सच्चा प्यार,
टूट ही जाऊँगा, टकरा बेवफाई के साहिल से ।
तो कैसे कर ले मोहब्बत किसी गाफिल से ,
फरेब करते रहे दोस्त वो मेरे फाजिल से ।
चलते चलते
जलाते है बड़े शौक से दिलों में सच्चा प्यार,
एक दिन ख़तम हो जाता है इसका वजूद जल - जल के यार
Tuesday, December 30, 2008
१) इन्सान अपनी तौहीन माफ़ कर सकता है भूल नही सकता।
२) कभी न गिरना कमाल नही, बल्कि गिर के संभल जाना कमाल है!
३) "जिसका वास्ता खुदा के साथ हो वो नाकाम नही होता "
नाकाम वो होता है जिसकी उम्मीदें दुनिया से वास्ता रखती हों ।
४) दो तरह से चीज़ें देखने में छोटी नजर आती हैं
एक दूर से ............
और
दूसरा गुरूर से .........
५) अपने दुश्मन को हजार मौका दो कि वो तुम्हारा दोस्त बन जाए
लेकिन...........
अपने दोस्त को एक भी मौका न दो कि वो तुम्हारा
दुश्मन बन जाए।
६) मैं बड़ों कि इज्जत इसलिए करता हूँ कि उनकी नेकियाँ (अच्छाई)
मुझसे ज्यादा है और
छोटों से प्यार इसलिए करता हूँ कि उनके गुनाह मुझसे कम हैं।
७) लोगों को उसी तरह माफ़ करो जैसे तुम 'खुदा' से उम्मीद रखते हो कि वो तुम्हे 'माफ़' करेगा।
८) खुशमिजाजी हमेशा खुबसूरती कि कमी को पुरा कर देती है।
इसलिए सदा मुस्कुराते रहिये!
९) "जिस व्यक्ति के अच्छे दोस्त हो वो कभी गरीब नही होता।"
विजय राजभर
२) कभी न गिरना कमाल नही, बल्कि गिर के संभल जाना कमाल है!
३) "जिसका वास्ता खुदा के साथ हो वो नाकाम नही होता "
नाकाम वो होता है जिसकी उम्मीदें दुनिया से वास्ता रखती हों ।
४) दो तरह से चीज़ें देखने में छोटी नजर आती हैं
एक दूर से ............
और
दूसरा गुरूर से .........
५) अपने दुश्मन को हजार मौका दो कि वो तुम्हारा दोस्त बन जाए
लेकिन...........
अपने दोस्त को एक भी मौका न दो कि वो तुम्हारा
दुश्मन बन जाए।
६) मैं बड़ों कि इज्जत इसलिए करता हूँ कि उनकी नेकियाँ (अच्छाई)
मुझसे ज्यादा है और
छोटों से प्यार इसलिए करता हूँ कि उनके गुनाह मुझसे कम हैं।
७) लोगों को उसी तरह माफ़ करो जैसे तुम 'खुदा' से उम्मीद रखते हो कि वो तुम्हे 'माफ़' करेगा।
८) खुशमिजाजी हमेशा खुबसूरती कि कमी को पुरा कर देती है।
इसलिए सदा मुस्कुराते रहिये!
९) "जिस व्यक्ति के अच्छे दोस्त हो वो कभी गरीब नही होता।"
विजय राजभर
Thursday, December 18, 2008
शायरी
शायरी
कैसे कहूं मैं तुमसे , अपने इस दिल की बात,
हिम्मत तो की इतनी, लबों ने ने पर न दिया साथ।
अपनी यह चाहत ले कर, करूँ मैं अब तुमसे क्या इजहार,
दिन तो कट जाते हैं कटती नही यह रात।
**************
क्या पता तुम्हे इस दिल की हालत,
जिस की सागर की गहराई तक सिर्फ़ तुम हो।
क्या जानो मेरी दीवानगी और जूनून,
के तुम इतनी दूर होते हुए भी,
दिल के बहुत करीब हो।
*************
कुछ गुस्सा, कुछ नखरा, कुछ इल्तिजा भी है आपकी,
हम से रूठना, हमे सताना,
तड़पाने की अदा भी है आपकी ।
हर बात पे हँसना, हर पल मुस्कुराना,
हर बातों से दिल धडकाना ।
अपनी शर्मीली नजरों से, सुर्ख होठों से,
हर साँसों को चूम लेना ।
क्या क्या करे यह दिल अफसाने बयां आपके ,
आप मसीहा -ऐ- इश्क हैं,
यह बन्दा खादिम है सिर्फ़ आपका।
विजय राजभर
Tuesday, November 18, 2008
एहसास
तुम्हारे आने पे ये एहसास हुआ है
की हमको तुमसे प्यार हुआ है
ये अरमान दिल में पहली बार हुआ है
थाम लो हाथ अब मेरा, ऐसा दिल बेकरार हुआ है
शिद्दत से तुम्हारा इंतज़ार हुआ है
बीत जाए तुम्हारे संग, दूर रहना तुमसे अब दुश्वार हुआ है
मोहब्बत बहुत सच्ची है यह तुमसे यकीन हुआ है
ख़ूबसूरत ज़िन्दगी का नज़ारा तुम्ही से हुआ है
प्यार का मौसम सारी ओर छाया हुआ है
जैसे हर पल खुशियों से भरा हुआ है
फरिश्तों का जिक्र कहानियों में सुना हुआ है
तुमसे मिलकर फरिश्तों का दीदार हुआ है
प्यार के अमन ओ चैन में कबीर खोया हुआ है
अब तुम्हे पाने को दिल बेताब हुआ है
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